1350 वर्ष पुरानी आस्था की विरासत! मां कलेही धाम पवई में धर्म, इतिहास और प्रकृति का अद्भुत संगम
पन्ना जिले की पहचान बना मां कलेही मंदिर, चैत्र नवरात्र के मेले से लेकर अखंड ज्योति और जवारों की परंपरा तक समेटे हुए है बुंदेलखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत
पन्ना, मध्यप्रदेश। विंध्य पर्वत श्रृंखला की सुरम्य तलहटी, पतने नदी का शांत तट और सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताएं… इन सबके बीच स्थित मां कलेही मंदिर पवई क्षेत्र की आस्था, संस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम है। पवई नगर से लगभग दो किलोमीटर दूर स्थित यह प्राचीन देवी धाम वर्षों से श्रद्धालुओं की श्रद्धा का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। शारदीय और चैत्र नवरात्र के दौरान यहां भक्तों की विशेष भीड़ उमड़ती है। मां के जयकारों, पूजा-अर्चना और धार्मिक आयोजनों से पूरा क्षेत्र भक्तिमय हो उठता है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मां कलेही की अष्टभुजाधारी प्रतिमा लगभग 1350 वर्ष प्राचीन है। मंदिर से जुड़ी धार्मिक परंपराएं, नवरात्र का विशाल मेला, अखंड ज्योति, लाल चुनरी में बंधे श्रीफल और जवारों की परंपरा इस धाम को विशिष्ट पहचान प्रदान करती हैं। धार्मिक महत्व के साथ-साथ यहां प्राचीन धरोहरों के संरक्षण और पर्यटन विकास की भी व्यापक संभावनाएं हैं।
अष्टभुजाधारी मां कलेही की प्रतिमा है विशेष आकर्षण
मां कलेही की अष्टभुजाधारी प्रतिमा अपने विशिष्ट स्वरूप और शिल्पकला के लिए जानी जाती है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, प्रतिमा की स्थापना विक्रम संवत 700 में हुई थी। माता के हाथों में शंख, चक्र, गदा, पद्म, तलवार और त्रिशूल सहित विभिन्न आयुध सुशोभित हैं। प्रतिमा में मां भगवती को महिषासुर का मर्दन करते हुए दर्शाया गया है। उनके चरणों के समीप भगवान शिव तथा दोनों ओर हनुमान जी और बटुक भैरव की उपस्थिति मंदिर की धार्मिक महत्ता को और बढ़ाती है।
श्रद्धालु मां कलेही को शक्ति और समृद्धि की प्रतीक मानते हैं। भक्त अपनी मनोकामनाएं लेकर माता के दरबार में पहुंचते हैं और परिवार की सुख-शांति, खुशहाली तथा कल्याण की प्रार्थना करते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही आस्था ने इस धाम को पवई ही नहीं, बल्कि आसपास के विस्तृत क्षेत्र में भी विशेष पहचान दिलाई है।
500 वर्ष पुरानी मानी जाती है चैत्र नवरात्र मेले की परंपरा
मां कलेही मंदिर में चैत्र नवरात्र के अवसर पर लगने वाला विशाल मेला धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय संस्कृति और व्यापार का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस मेले की परंपरा लगभग 500 वर्ष पुरानी मानी जाती है।
पुराने समय में मेले के दौरान ग्रामीण वर्षभर की जरूरतों के लिए अनाज, तेल, मसाले और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की खरीदारी करते थे। समय के साथ मेले का स्वरूप बदला है, लेकिन इसकी लोकप्रियता बनी हुई है। आज यहां मीना बाजार, झूले, नाटक-नौटंकी और मनोरंजन के अन्य साधन लोगों को आकर्षित करते हैं।
नवरात्र के दौरान आसपास के गांवों और दूरदराज के क्षेत्रों से श्रद्धालुओं के साथ व्यापारी भी पहुंचते हैं। इससे स्थानीय बाजारों में रौनक बढ़ती है और छोटे व्यापारियों को रोजगार के अवसर मिलते हैं।
बुंदेलखंड से महाकौशल तक फैली है मां कलेही की महिमा
मां कलेही के दर्शन के लिए बुंदेलखंड, बघेलखंड, मालवा, निमाड़ और महाकौशल सहित विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु पहुंचते हैं। भक्त माता के दरबार में मन्नत मांगते हैं और मनोकामना पूर्ण होने की प्रार्थना करते हैं।
मंदिर के समीप स्थित श्री हनुमान भाटे की सीढ़ियों पर श्रद्धालुओं के नाम और पते अंकित होने की परंपरा भी स्थानीय धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी है। वहीं, लोक परंपराओं में मां शारदा देवी मैहर, मां पद्मावती देवी पन्ना और मां कलेही देवी पवई के बीच विशेष धार्मिक संबंध की मान्यता प्रचलित है। इन मान्यताओं के चलते श्रद्धालुओं के बीच मां कलेही धाम का अलग स्थान है।
अखंड ज्योति और लाल चुनरी में बंधे हजारों श्रीफल आस्था के प्रतीक
नवरात्र के नौ दिनों में मां कलेही के दरबार में अखंड ज्योति प्रज्वलित करने की परंपरा विशेष महत्व रखती है। भक्त पूरे श्रद्धाभाव से माता की आराधना करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
मंदिर परिसर में लाल चुनरी में बंधे हजारों श्रीफल श्रद्धालुओं की अटूट आस्था को दर्शाते हैं। मान्यता के अनुसार, भक्त अपनी मनोकामना लेकर माता के दरबार में पहुंचते हैं और श्रीफल को लाल चुनरी में बांधकर अपनी प्रार्थना अर्पित करते हैं। मनोकामना पूर्ण होने पर चुनरी खोलने की परंपरा भी प्रचलित है।
यह परंपरा मां कलेही धाम की धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है, जो श्रद्धालुओं के विश्वास और माता के प्रति उनकी समर्पण भावना को प्रदर्शित करती है।
कन्या भोज और भंडारे में दिखती है सेवा और समर्पण की भावना
मां कलेही मंदिर में नवरात्र के दौरान कन्या भोज और नि:शुल्क भंडारे का विशेष महत्व है। स्थानीय जानकारी के अनुसार, नगर के युवाओं और श्रद्धालुओं के सहयोग से लगभग 25 वर्षों से कन्या भोज एवं भंडारे की परंपरा संचालित की जा रही है।
इस दौरान दूरदराज से आने वाले श्रद्धालुओं को भोजन-प्रसादी वितरित की जाती है। आयोजन में जनसहयोग और सामूहिक सहभागिता की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। धार्मिक आस्था के साथ सेवा, सहयोग और सामाजिक एकता का यह स्वरूप मंदिर की परंपराओं को और भी खास बनाता है।
जवारों की प्राचीन परंपरा, बुंदेलखंड की सांस्कृतिक पहचान
मां कलेही धाम में नवरात्र के दौरान जवारों की परंपरा का विशेष महत्व रहा है। स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, एक समय मां मैहर की शारदा देवी, पन्ना की फूला माता और आसपास के लगभग डेढ़ सौ गांवों से जवारे मां कलेही धाम लाए जाते थे।
भक्त सिर पर जवारे रखकर ढोल-मंजीरों की थाप पर पारंपरिक भक्ति गीत गाते हुए माता के दरबार पहुंचते थे। इस दौरान प्रस्तुत किए जाने वाले पारंपरिक करतब भी लोगों के आकर्षण का केंद्र रहते थे।
हालांकि, बदलते समय के साथ यह प्राचीन परंपरा धीरे-धीरे सीमित होती दिखाई दे रही है। क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी इस विरासत को सुरक्षित रखने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संगठनों और श्रद्धालुओं की सहभागिता आवश्यक है।
शिवलिंग, हनुमान प्रतिमा और 27 फीट ऊंची बाबा कैलाशी की प्रतिमा आकर्षण का केंद्र
मां कलेही मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर के अलावा कई अन्य धार्मिक स्थल भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। मुख्य द्वार के बाईं ओर श्री हनुमान जी महाराज की छह रुद्री प्रतिमा स्थापित बताई जाती है। परिसर में स्थित प्राचीन शिवलिंग भी शिवभक्तों की आस्था का केंद्र है।
इसके अतिरिक्त, विंध्य पर्वत की तलहटी में स्थापित लगभग 27 फीट ऊंची बाबा कैलाशी की शिव प्रतिमा विशेष आकर्षण का केंद्र है। प्रतिमा की जटाओं से गंगा प्रवाह का स्वरूप दर्शाया गया है। प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित यह धार्मिक स्थल श्रद्धालुओं के साथ पर्यटकों को भी आकर्षित करने की क्षमता रखता है।
प्राचीन मूर्तियों और ऐतिहासिक अवशेषों के संरक्षण की जरूरत
मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में चंदेलकालीन मूर्तियों के अवशेष होने की जानकारी स्थानीय स्तर पर सामने आती रही है। ये अवशेष क्षेत्र के प्राचीन इतिहास और सांस्कृतिक विरासत की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
ऐसे में आवश्यक है कि पुरातत्व विभाग और संबंधित प्रशासनिक संस्थाएं क्षेत्र का ऐतिहासिक सर्वेक्षण कराएं। प्राचीन मूर्तियों एवं स्थापत्य अवशेषों की प्रमाणिक पहचान, सूचीकरण और संरक्षण की दिशा में ठोस पहल की जाए, ताकि ऐतिहासिक धरोहर को नुकसान से बचाया जा सके और आने वाली पीढ़ियों को इसके महत्व से परिचित कराया जा सके।
धार्मिक पर्यटन के नक्शे पर चमक सकता है पवई का मां कलेही धाम
मां कलेही मंदिर का प्राकृतिक परिवेश, विंध्य पर्वत श्रृंखला की तलहटी, पतने नदी का तट और प्राचीन धार्मिक परंपराएं इसे पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती हैं। उचित सुविधाओं और योजनाबद्ध विकास के माध्यम से इस स्थल को धार्मिक पर्यटन के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है।
इसके लिए मंदिर परिसर में स्वच्छता, पेयजल, प्रकाश व्यवस्था, श्रद्धालुओं के विश्राम स्थल, सुरक्षित आवागमन और अन्य बुनियादी सुविधाओं का विस्तार जरूरी है। साथ ही, ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और धार्मिक स्थलों के व्यवस्थित विकास से स्थानीय व्यापार एवं रोजगार को भी बढ़ावा मिल सकता है।
यदि प्रशासन, पर्यटन विभाग, पुरातत्व विभाग और स्थानीय समुदाय मिलकर प्रयास करें, तो मां कलेही धाम को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं।
आस्था, संस्कृति और विरासत को सहेजना समय की जरूरत
मां कलेही मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि पवई क्षेत्र की धार्मिक आस्था, लोक संस्कृति, पारंपरिक आयोजनों और ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक है। नवरात्र का मेला, अखंड ज्योति, लाल चुनरी में बंधे श्रीफल, कन्या भोज, भंडारा और जवारों की परंपरा इस धाम की विशिष्ट पहचान हैं।
अब आवश्यकता है कि इन परंपराओं को संरक्षित करने के साथ मंदिर परिसर और आसपास की ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण तथा पर्यटन सुविधाओं के विकास पर भी गंभीरता से ध्यान दिया जाए। जनसहयोग और प्रशासनिक पहल के समन्वय से मां कलेही धाम धार्मिक आस्था के साथ पन्ना जिले की सांस्कृतिक एवं पर्यटन पहचान को नई ऊंचाई दे सकता है।

