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झिंझरी पीएम आवास प्रोजेक्ट: 1,500 गरीबों का हक छीन निजी हाथों में सौंपा; अपनी असफलता छिपाने शहर सरकार के जिम्मेदारों का खेल (कंपनी-नेता हुए मालामाल, गरीब पहले भी सड़क पर था और आज भी बेघर)

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झिंझरी पीएम आवास प्रोजेक्ट: 1,500 गरीबों का हक छीन निजी हाथों में सौंपा; अपनी असफलता छिपाने शहर सरकार के जिम्मेदारों का खेल

(कंपनी-नेता हुए मालामाल, गरीब पहले भी सड़क पर था और आज भी बेघर)

कटनी। शहर के सबसे गरीब, बेघर और वंचित तबके को पक्की छत देने का दावा करने वाली ‘शहर सरकार’ का सबसे बड़ा और दागदार कारनामा पर कोई चर्चा नही करता। जबकि 1500 से ज्यादा गरीबों और आम व्यक्ति का हक छीन कर निजी कंपनी को मुनाफा कमाने के लिए दे दिया गया है।
उल्लेखनीय है कि झिंझरी स्थित प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएवाई) के 1,512 आवासों के प्रोजेक्ट को तीन-तीन साल का अतिरिक्त समय मिलने के बावजूद पूरा करने में नाकाम रही कटनी नगर निगम ने अपनी असफलता को छिपाने के लिए एक ऐसा खेल खेला, जिसने 1,500 गरीब परिवारों के सपनों पर पानी फेर दिया।
वर्ष 2025 में नगर निगम ने शासन की आड़ लेकर पूरे प्रोजेक्ट को निजी हाथों (निजी डेवलपर्स) में सौंप दिया। नतीजा यह हुआ कि जिस जमीन पर गरीबों और आम व्यक्ति के लिए ईडब्ल्यूएस और एलआईजी फ्लैट्स बनने थे, वह अब पूरी तरह से व्यवसायिक प्रोजेक्ट बन चुका है। जहां सिर्फ और सिर्फ मुनाफे का खेल है। इस पूरे सौदे में ‘कंपनी और नेता मालामाल’ हो रहे हैं, जबकि जिस गरीब की आस इस मकान से जुड़ी थी, वह पहले भी सड़क पर था और आज भी किराए व पन्नी की झोपड़ियों में दर-दर भटकने को मजबूर है।

3 साल का ग्रेस पीरियड… फिर भी भ्रष्टाचार और लापरवाही की भेंट चढ़ा प्रोजेक्ट
वर्ष 2017-18 में स्वीकृत लगभग ₹85-90 करोड़ के इस झिंझरी प्रोजेक्ट (1,512 फ्लैट्स) को 2021-22 तक बनकर तैयार हो जाना था। कोरोना महामारी और शुरुआती अड़चनों का बहाना बनाकर ठेकेदार और अधिकारियों को पूरे 3 साल का अतिरिक्त समय दिया गया।

सवाल यह उठता है कि तीन साल का लंबा समय मिलने के बावजूद निर्माण कार्य पूरा क्यों नहीं हुआ?
अधिकारियों की सरपरस्ती: ठेकेदार पर मॉनिटरिंग का कोई दबाव नहीं बनाया गया, बजट का बंदरबांट होता रहा और काम कछुआ गति से चलता रहा।
महापौर और परिषद का मौन: नगर निगम की कमान संभाल रहीं महापौर प्रीति संजीव सूरी और परिषद के पार्षद इस घपले पर आंखें मूंदे बैठे रहे। समय पर ठोस समीक्षा करने के बजाय जिम्मेदार मूकदर्शक बने रहे।

अपनी नाकामी छिपाने को रचा ‘निजीकरण का खेल‘
जब समय-सीमा खत्म हुई और प्रोजेक्ट का ढांचा जस का तस खड़ा रहा, तो अपनी प्रशासनिक नाकामी और भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने के लिए नगर निगम ने वर्ष 2025 में इस जनकल्याणकारी योजना को प्राइवेट डेवलपर को सौंपने का रास्ता चुना।
इस हस्तांतरण के पीछे का असली ‘गणित’ अब खुलकर सामने आ रहा है:
व्यावसायिक मुनाफाखोरी: गरीबों के अफोर्डेबल हाउसिंग प्रोजेक्ट को रातों-रात कमर्शियल रियल एस्टेट प्रोजेक्ट में बदल दिया गया। अब यह व्यावसायिक प्रोजेक्ट में महंगे फ्लैट्स बनाकर मुनाफा कमाने का खेल जारी है।
नेताओं और कंपनियों की चांदी: बिल्डर-डेवलपर और नगर निगम के जिम्मेदारों की सांठगांठ से योजना की मूल आत्मा को ही मार दिया गया। इस सौदेबाज़ी से जहाँ एक तरफ निजी कंपनियाँ और राजनीतिक आका अपनी जेबें भर रहे हैं, वहीं आम जनता के टैक्स का पैसा और गरीबों का अधिकार दांव पर लग गया है।

आम व्यक्ति के हितों पर कुठाराघात
झिंझरी साइट पर वर्षों पहले अपना पंजीयन कराकर बैंक लोन की किस्तें भरने का सपना देख रहे हितग्राहियों का कहना है कि यह निर्णय सीधे तौर पर उनके अधिकारों पर डाका है। शहर सरकार ने जिस तरह से गरीबों का हक छीनकर बिल्डरों की झोली में डाला है, वह अक्षम्य है।
जनता और सामाजिक संगठनों की स्पष्ट मांग है:
जांच और कार्रवाई: इस पूरे मामले की ईओडब्ल्यू (EOW) या उच्चस्तरीय एसआईटी से जांच कराई जाए और महापौर प्रीति सूरी, संबंधित पार्षदों, तत्कालीन नगर निगम आयुक्तों व ठेकेदार पर आपराधिक मामला (FIR) दर्ज किया जाए।
निजीकरण तुरंत रद्द हो: वर्ष 2025 में किए गए निजी हस्तांतरण के फैसले को निरस्त कर झिंझरी की जमीन को पुन: गरीब-वंचित हितग्राहियों के लिए ही आरक्षित कर चरणबद्ध तरीके से पज़ेशन दिया जाए।

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