भारतीय संविधान की 17 प्रमुख विशेषताएँ| Bhartiya Samvidhan Ki Visheshta

भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएं (Bhartiya Samvidhan Ki Visheshta)- 1. कठोरता एवं लचीलापन का सम्मिश्रण- 2.धर्मनिरपेक्षता – 3.विभिन्न देशों के संविधानों से उपयोगी 

Table of Contents

संविधान की विशेषताएं (Bhartiya Samvidhan Ki Visheshta)

संविधान की वर्तमान रूप में इसकी विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

सबसे लंबा लिखित संविधान

भारत का संविधान विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान है। यह बहुत वृहद समग्र और विस्तृत दस्तावेज है मूल रूप से 1949 संविधान में प्रस्तावना 395 अनुच्छेद 22 भाग और 8 अनुसूचियां थी।

वर्तमान में 2016 इसमें एक प्रस्तावना 465 अनुच्छेद 25 भाग और 12 अनुसूचियां हैं। विश्व की किसी अन्य संविधान में कितने अनुच्छेद और अनुसूचियां नहीं है।

भारत के संविधान को विस्तृत बनाने के पीछे चार कारण हैं

1. भौगोलिक करण भारत का विस्तार और विविधता।

2. ऐतिहासिक इसके उदाहरण के रूप में भारत शासन अधिनियम 1935 के प्रभाव को देखा जा सकता है यह अधिनियम बहुत विस्तृत था।

3. जम्मू कश्मीर को छोड़कर केंद्र और राज्यों के लिए एकल संविधान।

4. संविधान सभा में कानून विशेषज्ञों का प्रभुत्व।

विभिन्न स्रोतों से बिहित

भारत के संविधान ने अपने विश्व के कई देशों की संविधान भारत शासन अधिनियम 1935 के उपबंधों से है। डॉक्टर अंबेडकर ने गर्व के साथ घोषणा की थी कि भारत के संविधान का निर्माण विश्व के विभिन्न संविधान को जानने के बाद किया गया है।

संविधान का अधिकांश ढांचागत हिस्सा भारत शासन अधिनियम 1935 से लिया गया है। संविधान का दार्शनिक भाग मौलिक अधिकार और राज्य के नीति निर्देशक तत्व क्रमस: अमेरिका और आयरलैंड से प्रेरित हैं।

 भारतीय संविधान की राजनीतिक भाग संघीय सरकार का सिद्धांत और कार्यपालिका और विधायिका के संबंध का अधिकांश हिस्सा ब्रिटेन के संविधान से लिया गया है।

संविधान के अन्य प्रावधान कनाडा आस्ट्रेलिया जर्मनी यू एस एस आर जोकि अब रूस, फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका जापान इत्यादि देशों के संविधान से लिए गए हैं।

लचीला एवं कठोर

संविधानों को लचीला एवं कठोर की दृष्टि से भी वर्गीकृत किया जाता है। कठोर संविधान उसे माना जाता है। जिसमें संशोधन करने के लिए विशेष प्रक्रिया की आवश्यकता हो उदाहरण के लिए अमेरिका का संविधान।

लचीला संविधान है वह संविधान कहलाता है। जिस में संशोधन की प्रक्रिया वही हो जैसी किसी आम कानूनों के निर्माण की जैसे ब्रिटेन का संविधान।

भारत का संविधान ना तो लचीला है और ना ही कठोर बल्कि यह दोनों का मिलाजुला रूप है अनुच्छेद 368 में दो तरह के संशोधनों का प्रावधान है।

कुछ बिन्दुओं को संसद में विशेष बहुमत से संशोधित किया जा सकता है उदाहरण दोनों सदनों में उपस्थित और मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों का दो तिहाई बहुमत और प्रत्येक सदन में कुल सदस्यों का 50% से अधिक है।

कुछ अन्य प्रावधानों को संसद के विशेष बहुमत और राज्यों के आधे से अधिक राज्यों के अनुमोदन से संशोधित किया जा सकता है।

इसके अलावा संविधान के कुछ प्रावधान आम विधाई प्रक्रिया की तरह संसद में सामान्य बहुमत के माध्यम से संशोधित किए जा सकते हैं। उल्लेखनीय है कि यह संशोधन अनुच्छेद 368 के अंतर्गत नहीं आते।

एकात्मकता की ओर झुकाव के साथ संघीय व्यवस्था

भारत का संविधान सरकार की स्थापना करता है। इसमें संघ के सभी आम लक्षण विद्वान है जैसे दो सरकार शक्तियों का विभाजन, लिखित संविधान, संविधान की सर्वोच्चता, संविधान की कठोरता, स्वतंत्र न्यायपालिका एवं द्विसदनीयता आदि।

यद्यपि भारतीय संविधान में बड़ी संख्या में एकात्मक और गैर संघीय लक्षण भी विद्वान है। जैसे एक सशक्त केंद्र, एक संविधान, एकल नागरिकता, संविधान का लचीलापन, एकीकृत न्यायपालिका, केंद्र द्वारा राज्यपाल की नियुक्ति, अखिल भारतीय सेवाएं, आपातकालीन प्रावधान इत्यादि।

फिर भी संविधान में कहीं संघीय शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है। दूसरी ओर अनुच्छेद 1 में भारत का उल्लेख राज्यों के संघ रूप में किया गया है।

इसके दो अभिप्राय है पहला भारतीय संघ राज्यों के बीच हुए किसी समझौते का निष्कर्ष नहीं है। और दूसरा किसी राज्य को संघ से अलग होने का अधिकार नहीं है।

सरकार का संसदीय रूप

भारतीय संविधान ने अमेरिका की अध्यक्षीय प्रणाली की बजाए ब्रिटेन के संसदीय तंत्र को अपनाया है। संसदीय व्यवस्था विधायिका और कार्यपालिका के मध्य समन्वय व सहयोग के सिद्धांत पर आधारित है। जबकि अध्यक्षीय प्रणाली दोनों के बीच शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत पर आधारित है।

संसदीय प्रणाली को सरकार के वेस्टमिंस्टर रूप उत्तरदाई सरकार और मंत्रिमंडलीय सरकार के नाम से भी जाना जाता है। संविधान केवल केंद्र में ही नहीं बल्कि राज्य में भी संसदीय प्रणाली की स्थापना करता है।

भारत में संसदीय प्रणाली की विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

1. वास्तविक व नाममात्र के कार्यपालकों की उपस्थिति,

2. बहुमत वाले दल की सत्ता,

3. विधायिका के समक्ष कार्यपालिका की संयुक्त जवाबदेही,

4. विधायिका में मंत्रियों की सदस्यता,

5. प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का नेतृत्व

6. निचले सदन का विघटन (लोकसभा अथवा विधानसभा)

संसदीय संप्रभुता एवं न्यायिक सर्वोच्चता में समन्वय

संसद की संप्रभुता का नियम ब्रिटिश संसद से जुड़ा हुआ है, जबकि न्यायपालिका की सर्वोच्चता का सिद्धांत अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय से लिया गया है।

जिस प्रकार भारतीय संसदीय प्रणाली ब्रिटिश प्रणाली से भिन्न है, ठीक उसी प्रकार भारत में सर्वोच्च न्यायालय की न्यायिक समीक्षा शक्ति अमेरिका सर्वोच्च न्यायालय से कम है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि अमेरिकी संविधान में ‘विधि की नियत प्रक्रिया’ का प्रावधान है। जबकि भारतीय संविधान में विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया अनुच्छेद 21 का प्रावधान है।

इसलिए भारतीय संविधान के निर्माताओं ने ब्रिटेन की संसदीय संप्रभुता और अमेरिका की न्यायपालिका सर्वोच्चता के बीच उचित संतुलन बनाने को प्राथमिकता दी।

एकीकृत स्वतंत्र न्यायपालिका

भारतीय संविधान एक ऐसी न्यायपालिका की स्थापना करता है, जो आपने आप में एकीकृत होने के साथ साथ स्वतंत्र है।

भारत की न्याय व्यवस्था में सर्वोच्च न्यायालय शीर्ष पर है। इसके नीचे राज्य स्तर पर उच्च न्यायालय है। राज्यों में उच्च न्यायालय के नीचे क्रमवार अधीनस्थ न्यायालय है।

जैसे जिला अदालत व अन्य निचली अदालतें न्यायालयों का एकल तंत्र केंद्रीय कानूनों के साथ-साथ राज्य कानूनों को लागू करता है। हालांकि अमेरिका में संघीय कानूनों को संघीय न्यायपालिका और राज्य कानूनों को राज्य न्यायपालिका लागू करती है।

सर्वोच्च न्यायालय संघीय अदालत है यह शीर्ष न्यायालय है। जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा की गारंटी देता है, और संविधान का रक्षक है।

मौलिक अधिकार

संविधान के तीसरे भाग में छह मौलिक अधिकारों का वर्णन किया गया है। ये अधिकार हैं:

1. समानता का अधिकार अनुच्छेद 14 से 18

2. स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद 19 से 22

3. शोषण के विरुद्ध अधिकार अनुच्छेद 23 से 24

4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद 25 से 28

5. सांस्कृतिक व शिक्षा का अधिकार अनुच्छेद 29 से 30

6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार अनुच्छेद 32

मौलिक अधिकार का उद्देश्य वस्तुतः राजनीतिक लोकतंत्र की भावना को प्रोत्साहन देना है। यह कार्यपालिका और विधायिका की मनमानी कानूनों पर निरोधक की तरह काम करते हैं।

उल्लंघन की स्थिति में इन्हें न्यायालय के माध्यम से लागू किया जा सकता है जिस व्यक्ति के मौलिक अधिकार का हनन हुआ है। वह सीधे सर्वोच्च न्यायालय की शरण में जा सकता है जो अधिकारों की रक्षा के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार प्रछा व उत्प्रेषण जैसे अभिलेख या रिट जारी कर सकता है।

हालांकि मौलिक अधिकार कुछ सीमाओं के दायरे में आते हैं लेकिन अपरिवर्तनीय भी नहीं हैं संसद इन्हें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से समाप्त कर सकती है अथवा इन में कटौती भी कर सकती है।

अनुच्छेद 20- 21 द्वारा प्रदत्त अधिकारों को छोड़कर राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान इन्हें स्थगित किया जा सकता है।

राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत

डॉक्टर बी आर अंबेडकर के अनुसार राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत भारतीय संविधान की अनूठी विशेषता है इनका उल्लेख संविधान की चौथे भाग में किया गया है।

मोटे तौर पर तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है- सामाजिक, गांधीवादी तथा उधार बौद्धिक।

नीति निदेशक तत्वों का कार्य सामाजिक व आर्थिक लोकतंत्र को बढ़ावा देना है इनका उद्देश्य भारत में एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है। हालांकि मौलिक अधिकारों की तरह इन्हें कानून रूप में लागू नहीं किया जा सकता।

मौलिक कर्तव्य

मूल संविधान में मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख नहीं किया गया है। इन्हें स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश के आधार पर 1976 के 42 वें संविधान संशोधन के माध्यम से आंतरिक आपातकाल(1975-77) के दौरान शामिल किया गया था। 2002 के 86 वें संविधान संशोधन ने एक और मौलिक कर्तव्य को जोड़ा।

संविधान के 4(ए)भाग में एक मौलिक कर्तव्यों का जिक्र किया गया है। जिसमें केवल एक अनुच्छेद 51(क) है। इसके तहत प्रत्येक भारतीय का यह कर्तव्य होगा। कि वह संविधान राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करें, राष्ट्र की संप्रभुता एकता और अखंडता की रक्षा करें।

हमारी मिश्रित संस्कृति की समृद्धि धरोहर का अनुरक्षण करें सभी लोगों में आपसी भाईचारे की भावना का विकास करें इत्यादि। नीति निदेशक तत्वों की तरह कर्तव्य को भी कानून रूप में लागू नहीं किया जा सकता।

एक धर्मनिरपेक्ष राज्य

भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष है इसलिए यह किसी धर्म विशेष को भारत के धर्म के तौर पर मान्यता नहीं देता। संविधान के निम्नलिखित प्रावधान भारत के धर्मनिरपेक्ष लक्षणों को दर्शाते हैं।

1. वर्ष 1976 के 42 वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष शब्द को जोड़ा गया।

2. प्रस्तावना हर भारतीय नागरिक की आस्था, पूजा-अर्चना व विश्वास की स्वतंत्रता की रक्षा करती है।

3. किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समान समझा जाएगा और उसे कानून की समान सुरक्षा प्रदान की जाएगी (अनुच्छेद 14)

4. धर्म के नाम पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा (अनुच्छेद 15)

5. सार्वजनिक सेवाओं में सभी नागरिकों को अवसर दिए जाएंगे (अनुच्छेद 16)

6. हर व्यक्ति को किसी भी धर्म को अपनाने व उसके अनुसार पूजा अर्चना करने का समान अधिकार है (अनुच्छेद 25)

7. हर धार्मिक समूह अथवा इसके किसी हिस्से को अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार है (अनुच्छेद 26) ।

8. किसी भी व्यक्ति को किसी भी धर्म विशेष का प्रचार के लिए किसी प्रकार का कर देने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा (अनुच्छेद 27)

9. किसी भी सरकारी शैक्षिक संस्थान में किसी प्रकार के धार्मिक निर्देशन नहीं दिए जाएंगे (अनुच्छेद 28)

10. नागरिकों के किसी भी वर्ग को अपनी भाषा लिपि अथवा संस्कृति को संरक्षित रखने का अधिकार है (अनुच्छेद 29)

11. अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षिक संस्थानों की स्थापना करने और उन्हें संचालित करने का अधिकार है (अनुच्छेद 30)

12. राज्य सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता बनाने के लिए प्रयास करेगा (अनुच्छेद 44)

धर्मनिरपेक्षता की पश्चिमी अवधारणा धर्म और राज्य के बीच पूर्ण अलगाओ रखती है। धर्मनिरपेक्ष तक यह नकारात्मक अवधारणा भारतीय परिवेश में लागू नहीं हो सकती।

इसलिए भारतीय संविधान में सभी धर्मों को समान आदर अथवा सभी धर्मों की समान रूप से रक्षा करते हुए धर्मनिरपेक्षता की सकारात्मक पहलुओं को शामिल किया गया है।

सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार

भारतीय संविधान द्वारा राज्य विधानसभाओं और लोकसभा के चुनाव के आधार स्वरूप सार्वभौम वयस्क मताधिकार को अपनाया गया है।

हर वह व्यक्ति जिसकी उम्र कम से कम 18 वर्ष है, उसे धर्म, जाति, लिंग, साक्षरता अथवा संप्रदाय इत्यादि के आधार पर कोई भेदभाव किए बिना मतदान करने का अधिकार है।

वर्ष 1989 में 61 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1988 के द्वारा मतदान करने की उम्र को 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दिया गया।

देश के वृहद आकार जनसंख्या उच्च गरीबी सामाजिक असमानता अशिक्षा आदि, को देखते हुए संविधान निर्माताओं द्वारा सार्वभौमिक मताधिकार को संविधान में शामिल करना एक सराहनीय प्रयोग था।

व्यस्क मताधिकार लोकतंत्र को बढ़ा आधार देने के साथ-साथ आम जनता के स्वाभिमान में वृद्धि करता है। समानता के सिद्धांत को लागू करता है, अल्पसंख्यकों को अपने हितों की रक्षा करने का अवसर देता है तथा कमजोर वर्गों के लिए नई आशाएं और प्रत्याशा जगाता है।

एकल नागरिकता

यद्यपि भारतीय संविधान फेडरल है, और 2 लक्षणों एकल व संघीय का प्रतिनिधित्व करता है। मगर इसमें केवल एकल नागरिकता का प्रावधान है, अर्थात भारतीय नागरिकता।

दूसरी ओर अमेरिका जैसे देशों में प्रत्येक व्यक्ति के पास न केवल देश की नागरिकता होती है। बल्कि वह जिस राज्य में रहता है, उसकी भी नागरिकता होती है।

इसलिए अधिकारों के दो समूहों का लाभ उठाता है – पहला राष्ट्रीय सरकार द्वारा प्रदत तथा दूसरा राज्य सरकार द्वारा प्रदत।

भारत मैं सभी नागरिकों को चाहे वो किसी भी राज्य से पैदा हुआ हो या रहता हो संपूर्ण देश में नागरिकता के समान राजनीतिक और नागरिक अधिकार प्राप्त होते हैं। और उनमें कोई भेदभाव नहीं किया जाता।

स्वतंत्र निकाय

भारतीय संविधान केवल विधायिका, कार्यपालिका व सरकार और न्यायिक अंग ही उपलब्ध कराता है बल्कि यह कुछ स्वतंत्र निकायों की स्थापना भी करता है।

इन्हें संविधान ने भारत सरकार के लोकतांत्रिक तंत्र की महत्वपूर्ण स्तम्भों के रूप में परिकल्पित किया है। वैसे कुछ स्वतंत्र निकाय निम्नलिखित हैं-

1. संसद और राज्य विधानसभाओं भारत के राष्ट्रपति और भारत के उपराष्ट्रपति के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने हेतु निर्वाचन आयोग।

2. राज्य और केंद्र सरकारों के खातों के अंकेक्षण के लिए भारत का नियंत्रक एवं महालेखाकार एक जनता के पैसे की संरक्षक होते हैं। और सरकार द्वारा दिए गए खर्चे की वैधानिकता और उनके उचित होने पर टिप्पणी करते हैं।

3. संघ लोक सेवा आयोग यह अखिल भारतीय सेवाओं व उच्च स्तरीय केंद्रीय सेवाओं के लिए भर्ती हेतु परीक्षाओं का आयोजन करता है। तथा अनुशासनात्मक मामलों पर राष्ट्रपति को सलाह देता है।

4. राज्य लोक सेवा आयोग जिसका काम हर राज्य के सेवाओं के लिए भर्ती हेतु परीक्षाओं का आयोजन करना है, वह अनुशासनात्मक मामलों पर राज्यपाल को सलाह देना है।

आपातकालीन प्रावधान

आपातकाल की स्थिति से प्रभावशाली ढंग से निपटने के लिए भारतीय संविधान में राष्ट्रपति के लिए वृहद आपातकालीन प्रावधानों की व्यवस्था है।

इन प्रावधानों को संविधान में शामिल करने का उद्देश्य है- देश की संप्रभुता और एकता, अखंडता और सुरक्षा, संविधान एवं देश के लोकतांत्रिक ढांचे को सुरक्षित करना।

संविधान में तीन प्रकार की आपातकाल की विवेचना की गई है

1. राष्ट्रीय आपातकाल: युद्ध आक्रमण अथवा सशस्त्र विद्रोह द्वारा पैदा हुई राष्ट्रीय शांति की अवस्था (अनुच्छेद 352)।

2. राज्य में आपातकाल (राष्ट्रपति शासन): राज्यों में संवैधानिक तंत्र की असफलता (अनुच्छेद 356) या केंद्र के निर्देशों का अनुपालन करने में असफलता (अनुच्छेद 365) ।

3. वित्तीय आपातकाल: भारत की वित्तीय स्थिति या प्रत्यय संकट में हो (अनुच्छेद 360) ।

आपातकाल के दौरान देश की पूरी सत्ता केंद्र सरकार के हाथों में आ जाती है। और राज्य केंद्र के नियंत्रण में चले जाते हैं। इससे संविधान में संशोधन किए बगैर देश का ढांचा संघीय से एकात्मक हो जाता है।

राजनीतिक तंत्र का संघीय से एकात्मक में परिवर्तित होना भारतीय संविधान की एक अद्वितीय विशेषता है।

त्रिस्तरीय सरकार

मूल रूप से अन्य संघीय संविधानों की तरह भारतीय संविधान में 2 स्तरीय राज्य व्यवस्था और संगठन के संबंध में प्रावधान तथा केंद्र एवं राज्यों की शक्तियां प्रविष्ट थी।

बाद में वर्ष 1992 में 73वें एवं 74 वे संविधान संशोधन ने तीन स्तरीय सरकार का प्रावधान किया गया जो विश्व के किसी औरसं विधान में नहीं है।

संविधान में 1 नए भाग 9 एवं नई अनुसूची 11 वी जोड़कर 1992 के 73वें संविधान संशोधन के माध्यम से पंचायतों को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई। इसमें एक नया भाग 9 जोड़ा गया।

इसी प्रकार से 74 वे संविधान संशोधन विधेयक 1992 ने एक नए भाग 9a तथा नई अनुसूची 12वीं को जोड़कर नगर पालिकाओं को संवैधानिक मान्यता प्रदान की।

सहकारी समितियां

97 वां संविधान संशोधन अधिनियम 2011 ने सहकारी समितियों को संवैधानिक दर्जा और संरक्षण प्रदान किया। इस संदर्भ में परिवर्तन संविधान में इसने किए।

1. इसने सहकारी समिति गठित करने के अधिकार को मौलिक अधिकार बना दिया अनुच्छेद 19।

2. इसने एक नया राज्य के नीति निदेशक तत्व जोड़ा सहकारी समितियों के प्रोत्साहन देने के लिए अनुच्छेद 43B ।

3. इसने संविधान में एक नया भाग 9 ख जुड़ा सहकारी समितियां शीर्षक से अनुच्छेद 243ZH से लेकर 243ZT तक।

नया भाग 9 बी के तहत अनेक ऐसे प्रावधानों के द्वारा सुनिश्चित किया गया कि देशभर में सहकारी समितियां लोकतांत्रिक व्यवसायिक स्वायत्त ढंग से तथा आर्थिक मजबूती के साथ कार्य करें।

यह संसद को अंतर राज्य सहकारी समितियों तथा राज्य विधायिका को अन्य सहकारी समितियों के लिए उपयुक्त कानून बनाने की शक्ति प्रदान करता है।

FAQ

भारतीय संविधान के जनक कौन है?

भीम राव अंबेडकर को भारतीय संविधान का जनक माना जाता है।

भारत के संविधान में कुल कितनी धारा है?

जब हमारे संविधान की रचना हुई थी तब इसमें 395 अनुच्छेद या धाराएं थीं ।

भारत के संविधान में कुल कितने शब्द हैं?

भारत का संविधान विश्व के किसी भी सम्प्रभु देश का सबसे लम्बा लिखित संविधान है, जिसमें, उसके अंग्रेज़ी-भाषी संस्करण में 146,385 शब्दों के साथ, 25 भागों( 22+4A,9A,14A) में 448 अनुच्छेद, 12 अनुसूचियाँ है ।

संविधान में तीन अंग कौन से हैं?

भारतीय संविधान के अनुसार भारत की संसद के तीन अंग हैं- 1. राष्ट्रपति, 2. लोकसभा व 3. राज्यसभा।

भारतीय संविधान लेखक कौन हैं?

प्रेम बिहारी नारायण रायजादा

भारत में कानून का पिता कौन है?

भीमराव रामजी अंबेडकर

संविधान में किसकी तस्वीर है?

भगवान राम, सीता और लक्ष्मण की पेंटिंग्स हैं।

संविधान के हर पन्ने पर किसका नाम है?

संविधान के हर पेज पर लेखक प्रेम बिहारी नारायण रायजादा का नाम लिखा हुआ है।

संविधान कितने भाषा में लिखा है?

हिंदी और अंग्रेजी दोनों है। भारतीय संविधान की मूल प्रतियां, हिंदी और अंग्रेजी में लिखी गई हैं।

भारत की राष्ट्रीय भाषा कौन सी है?

संविधान के अनुसार भारत की कोई राष्ट्रीय भाषा नहीं है, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार देश की आधिकारिक भाषा देवनागरी लिपि में हिंदी होगी।

भारत का मूल संविधान कहां है?

भारतीय संसद का पुस्तकालय है। पुस्तक का मूल भाग भारतीय संसद के पुस्तकालय में एक विशेष हीलियम से भरे डिब्बे में रखा गया है।

हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा क्यों नहीं है?

भारत के संविधान में किसी भी भाषा को राष्ट्रीय दर्जा नहीं दिया गया है । अतः भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है।

भारतीय संविधान का अर्थ क्या है?

” भारतीय संविधान ” के लिए हिंदी शब्द; यह ‘भारत का सर्वोच्च कानून’ है; यह 26 जनवरी 1950 से प्रभाव में आया।

प्रस्तावना कहाँ से लिया गया है?

प्रस्तावना की भाषा को ऑस्ट्रेलिया संविधान से लिया गया है।

भारत का संविधान कब लागू हुआ?

26 जनवरी 1950 को प्रवृत्त हुआ।

पहला संविधान दिवस कब मनाया जाता है?

भारत सरकार ने 19 नवंबर 2015 को राजपत्र अधिसूचना द्वारा 26 नवंबर को संविधान दिवस के रूप में घोषित किया।

संविधान सभा के अध्यक्ष कौन है?

डॉ राजेन्द्र प्रसाद को सभा का स्थायी अध्यक्ष चुना गया।

विश्व का सबसे लंबा संविधान कौन सा है?

भारतीय संविधान विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान है।

संविधान के पिता का क्या नाम है?

भीम राव अंबेडकर को भारतीय संविधान का जनक माना जाता है। वह भारत के संविधान के मुख्य वास्तुकार थे।

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